अखिल अमेरिकीय हास्य कवि सम्मेलन
पिछले रविवार ( १९ नवम्बर २००६) को हमने हिन्दी यू.एस.ए. द्वारा अयोजित कवि सम्मेलन देखा | बहुत दिनो बाद हिन्दी मे इतना अच्छा कार्यक्रम देखाँ.
हम भारतीय, जो अमेरिका मे है को हमेशा समय का अभाव ही रहता है लेकिन हिन्दी का यह कार्यक्रम शायद सबसे महत्वपूर्ण था , जो लोग इसे नही देख पाये शायद मै आशनी से बता नही सकता कि उन्होने क्या खोया | एक आशा की किरण .. एक बीते दिनो की याद .. कुछ गुदगुदी .. कुछ ठहाके .. ओर बहुत अरसो के बाद अपनो के साथ एक शाम |
हम लोग हर रविवार को पूज्य पाडूरँग शास्त्री प्रेणित स्वाध्याय के प्रवचन सुनने जाते है | इस रविवार को प्रवचन के बाद भगवद्ग़ीता की जयन्ती के लिये गीता के श्लोको के बाद बच्चो ने श्री कृष्ण या अर्जुन के बचपन की कहानिया प्रस्तुत किया | उस कार्यक्रम के बीच से उठकर आने मे थोडी ग्लानि हुई, लेकिन ईश्वर का दिल बडा है वह हमे जरुर माफ कर देगा हमारी साँय प्रार्थना सुनकर |
बहरहाल किसी तरह हम अपने परिवार के साथ निकले लेकिन फिर पाया कि वहा का पता तो सिर्फ वाँईस मेल मे ही है , उपर से रटगर्स का परिन्गड भी दो नगरो ओर रैरिटन नदी के किनारो पर बिखारा पडा है | पहले हम पिसकाटवये की ओर चले फिर से वाय्स मेल सुना तो लगा नही यह तो न्यु ब्रनस्वीक का क्षेत्र है | फिर जब १८ से कामर्सियल की ओर गये तो सडक का काम चालू होने से बाहर जाने का रास्ता चला गया, कोई बात नही युटर्न मारा तो सीधा रास्ता सामने था, यही नही हिन्दी यू.एस.ए. के कार्यकर्ताओ ने प्यारी - २ हिन्दी मे लिखी दिशा पटिकाए भी लगा रखी थी | शायद यह छोटी - २ चीजे की कमी हमे यहा कुछ ज्यादा महसूस होती है |
हम पहुचे तो मन्च पर हमारे भारतीय दूतावास के प्रतिनिधि थे | उनके समर्थन के आश्वाशन से खुशी हुई लेकिन कार्य तो हमे ही करना होगा | उसके बाद उपेन्द्र शिवकुला जी आये, उनका एक मद्रासी होकर भी हिन्दी मे बोलना अच्छा लगा | सबसे ज्यादा गर्व तो उन तमाम कार्यकर्ताओ को देखकर हुवा जो अपना खुद का वित्त खर्च कर कर हिन्दी शिखाने का काम बरसो से कर रहे है |
बाद मे श्रीमती विन्देशवरी जी मन्च पर आयी , उनकी कविताये आम भारतीय; जो अमेरिका मे है , के लिए एकदम सटीक थी | हर कोई यहा पैसा कमाने आता है और ज्यादातर लोग यहा की धन की चकाचौध मे खो जाते है ,शायद भाषा और सन्स्कृति को प्रेम करने वाले लोगो के अलावा | उन लोगो के लिये मेरी एक सलाह है कि बन्जारो का इतिहास देख लो ,युरोप के जिप्सीयो का जीवन आगे चलकर अगर नही जीना है तो चेतो, जागो और हिन्दी , हिन्दु और हिन्दुस्तान के कृतज्ञ रहो | विन्देशवरी जी की कविताये इतनी सरल थी कि मेरे बच्चे जो अमेरिका मे बडे हुये है भी समझ रहे थे |
अभिनव जी कवितावो का क्या कहना , न सिर्फ साहित्यीक दृष्टि से बल्कि उनके पीछे के विचारो का सम्पूर्णता थी | उन्होने ने हमे गुदगुदाया, हँसाया, रूलाया और याद दिलायी उन बीते हुये बरसो की जब हम इस विदेश की भागदौड से दूर स्वतन्त्र पक्षी की तरह जहा मन भाया वहा गये, जो मन भाया वह किया|
देवेन्द्र जी की कवितावो ने हमे झँझोरा उस सुप्तावस्था से जिसमे अमेरिका मे रहने वाले ज्यादातर भारतीय रहते है | जिनका सपना एक और डन्किन डोनट या लान्डरोमैट खोलने तक रह जाता है|
मेरी धर्मपत्नी ने शायद अपना अनुभव एक वाक्य मे बहुत अच्छे से कहा ” बरसो मे पहली बार मै इतना हँसी हूँ ” | मै भी सोचता हू कि यह एक बहुत ही अच्छा कार्यक्रम था और काश हमने पूरा देखा होता | उससे भी बढकर अच्छा यह होता की काश हमारे देश के सारे वो लोग हमारे साथ होते जिन्हे अपनी भाषा और सँस्कृति से शायद उतना ही प्यार है लेकिन वो इस मायानगरी मे खो गये है |
सँस्कृति या भाषा का काम बिना किसी फल की कामना के बिना करना आशान नही है,यह निरन्तर साधना है | यह गीता का सबसे महत्वपुर्ण सन्देश है | इसी लगाव की कमी के कारण है सोफ्टवेर मे अग्रित भारत देश कि मातृभाषा का कम्पूटर के रोजाना कामो मे नगण्य उपयोग हो रहा है | इस सन्दर्भ मे हम देखेगे तो अन्दाजा होगा कि श्री देवेन्द्र जी और उनके कार्यकर्ताओ द्वारा हिन्दी उ.स.ए. का कार्य कितना सराहनीय है |